विषय पर आने से पहले, मैं अपनी उन सभी बहनों को दिल से सल्यूट करता हूं, जो सीतारसोई परिवार से जुड़कर, एक बहुउद्देश्यीय, विश्व कल्याणकारी मिशन की सफलता की इबारत लिख दी है। और यह बात आप सभी को हैरत में डाल देगी कि इन सभी सम्मानित बहनों में कुछ-एक को छोड़कर किसी को पता ही नहीं है कि उन्होंने सा ऐतिहासिक काम किया है, उन्हें बस इतना पता है कि सीतारसोई के फूड प्रोडक्ट्स शुद्ध व प्राकृतिक हैं इनमें किसी भी प्रकार का केमिकल नहीं डाला जाता है। एक बार फिर मैं इन बहनों का हार्दिक स्वागत व अभिनंदन करता हूं। स्त्री के प्रकृतिस्वरूपा रूप को विष्लेशित करने के लिये हमें प्रकृति से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण बातों को जानना बेहद जरूरी हैं। हमारे चारों ओर जो भी, दृश्य या अदृश्य जितनी भी चीजे हैं, उन सभी चीजों के सम्लित रूप को ही प्रकृति कहते हैं। और इस प्रकृति की सबसे अनूठी रचना इंसान है। इस समस्त सृष्टि में केवल मनुष्य.ही ऐसा हैं जो प्रकृति को अक्षुण बनाये रख सकता है। बहुत विडम्बना है कि मानव पथभ्रष्ट हो गया है वह खुद को प्रकृति से बड़ा समझ बैठने की चूक कर बैठा है जिसका नतीजा महाविनाश के संकेत मिलने शुरू हो गये है। आइये जानते है वो कौन से संकेत हैं, जिन्हें आप भी जानते हैं। 1- जलसंकट- भूमिगत जल का दोहन इतना अधिक हो गया है कि जल का यह भण्डार लगातार खत्म होता जा रहा है, सन् 2000 में कानपुर में जलस्तर 80-90 फिट के मध्य था और आज 130-140 फिट। 20 वर्पों में 50 फिट के लगभग जलस्तर नीचे पहुंच गया है। यदि यही हालत रही तो आगे आने वाले 20 वर्षो में क्या हमें पीने के लिये पानी नसीब होगा, जाहिर है नहीं, और इसका पहला उदाहरण चेन्नई बन गया है जहां भूमिगत जल पिछले वर्ष समाप्त हो चुका है। वहीं दूसरी ओर लगातार धरती का तापमान बढ़ रहा है, पिछले 10 वर्षो सें लगातार इसमें वृद्धि हुई है, आज हालत यह है कि जून के महीने में 49 डिग्री से. तक ताफमान पहुत जाता है, इतने तापमान में खुला चलने पर चक्कर आने लगते है तो कल्पना कीजिये कि अगले बीस वर्पो में जब तापमान 55-60 डिग्री होगा तब क्या होगा। जैसा कि हमें पता है कि हमारी पृथ्वी का दो-तिहाई हिस्सा पानी है और एक-चौथाई हिस्सा स्थल है, जहा पर समस्त वनस्पतियां, जीव-जंतु रहते है। दो-तिहाई जल का एक बहुत बड़ा भाग बर्फ के रूप में है( ग्लेशियर )। बढ़ रही गर्मी के कारण यह बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे समुद्री जलस्तर लगातार बढ़ रहा है, यदि इसी तरह यह पिघलते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब सब-कुछ पानी में डूब जायेगा। 2- स्वास्थ्य व कृषि संकट- कृषि का संबन्ध सीधे तौर पर प्रकृति से जुड़ा है, लेकिन विदेशियों ने अपने शाषनकाल में कृषि का व्यवसाईकरण कर दिया गया। यही कारण है कि अग्रेजी शासनकाल में भारतीय कृषि व्यवस्था चौपट हो गयी और सोने की चिड़िया कहा जाने वाले देश के अन्नदाता व मजदूर वर्ग भुखमरी के शिकार होने लगे, इस स्थिति से उबरने के लिये अधिक उत्पादन के नाम पर वही विदेशी अपने देशों जहर बनाकर भारत के खेतों पर डलवाने लगे। नतीजा यह हुआ कि 1970 के बाद बेतहाशा ढंग से लगातार रासायनिक खादों, कीटनाशकों, खरपतवारनाशियों, प्रिजर्वेटिव के रुप, प्रयोग किये जा रहे है, इस व्यवस्था के घातक परिणाम सामने आ रहे है जैसे- किसानों की हालत तो नहीं सुधरी बल्कि धरती की जैव विविधता नष्ट होती चली गयी, जमीने बंजर होने की ओर बढ़ रही है, इस जहरीली मृदा से विषाक्त खाद्यान्न पैदा हो रहे है, बची खुची कसर मिलावट खोर पूरी कर रहे हैं यही कारण है कि अब 45-50 साल के बाद आदमी दवाओं व डाक्टर के भरोसे ही जी रहे हैं। कैंसर, मोटापा, डायबटीज जैसी घातक बीमारियां इसी जहरीले भोजन की देन है। कृषि एक ऐसा वृहत्त विषय है जो कि हमारे जीवन के आधार के साथ प्रकृति के सिस्टम से सम्बंधित है, यदि हमने कृषि को पुन: प्रकृति से सम्बंधित कर दें तो प्रकृति फिर से स्वस्थ होने लगेगी और हमारी आने वाली पीढि़या लम्बे समय तक धरती में निवास करती रहेंगी। उपरोक्त कारणों से सन् 2010 में एक संस्था, एसपीएल ग्रामीण उत्थान समिति का गठन किया गया, जिसका कार्य किसानों को जैविक खेती करने के लिये प्रोत्साहित करना था, संस्था के जैविक खेती अभिनव प्रसार कार्यक्रम के तहत सालों गावों-गावों घूमकर किसानों को जागरूक किया गया। इस कार्यक्रम में चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर उ.प्र., कृषि विभाग कानपुर नगर व बुंदेलखंड आर्गेनिक प्रा.लि. झांसी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। आज बहुत सारे किसान जैविक खेती अपना रहे हैं। लेकिन अभी यह कार्यक्रम सफल नही हो रहा था, हमारे जैविक किसान साथियों की एक पीड़ा थी कि जैविक उपजों के लिये संगठित बाजार नहीं था इसलिये वो ऊबने लगे। तब हमें एक कदम और उठाना पड़ा और वो है जैविक खाद्यान्नों के लिये संगठित बाजार खड़ा करना। अत: सीतारसोई को अवतरित करना पड़ा। यहा पर भी संघर्ष कम नहीं था, मैं स्यमं बड़े-बड़े दुकानदारो, शापिंग मालों में मिला, कुछ लोग स्टोर खोलने की इच्छा जताई, लेकिन मुझे हर जगह सिर्फ व्यापार नजर आया। पैकिंग ऐसी हो कि देखते ही लोगों को पसंद आ जाये, रेट ये हो, ये लाइसेंस हो, ये सब बाते मुझे सुनने को मिली कोई एक भी ऐसा न मिला जिसे प्रकृति की पीड़ा का अहसास हो। हमारी पूरी टीम हतोत्साहित हो रही थी फिर एक ऐसी दूरदर्शी समाजसेवी शक्स मिल गयी जो प्रकृति की वेदना को बहुत अच्छे से समझ रही थी, मैं दिल से अर्चना दीदी के जज्बे को सलाम करता हूं।फिर धीरे-2 कयी सारी बहने जुड़ती चली गयी और आज इस कार्यक्रम की कामयाबी की मजबूत नींव रख दी है। मेरे दिमाक में हमेशा एक बात बनी रहती है कि मानव सभ्यता के आरम्भ में स्त्रियों नें ही सबसे पहले मिट्टी में बीज बोकर पौधे उगाये थे और पूरी मानव जाति को जंगली से सामाजिक प्राणी बना दिया। और आज फिर से वही आगे आयी है। आज मुझे शिद्दत से अहसास हो रहा है कि वाकयी स्त्री प्रकृति स्वरुपा है। धन्यवाद रवि उमराव- जैविक खेती प्रचारक, फाउंडर- एसपीएल ग्रामीण उत्थान समिति, डायरेक्टर- अयाना फूड & आर्गेनिक्स

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