लेखिका डॉ. हर्ष प्रभा गाजियाबाद NCR नई दिल्ली

बात 12 अप्रैल 2011 की है। अभागा दिन जिस दिन अरुणिमा सिन्हा जी लखनऊ से पद्मावती एक्सप्रेस से दिल्ली जा रही थी।उन्हें नोएडा में फुटबॉल मैच खेलना था।रेल के सामान्य श्रेणी के डब्बे में अचानक कुछ लुटेरे आए और लूटमार करने लगे ।जैसे ही एक लुटेरे ने अरुणिमा जी का पर्स और चेन छीनने की कोशिश की अरुणिमा जी उनसे भिड़ गईं। वह अकेली और लुटेरों के पूरे गिरोह ने उन्हें चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया ।वह दूसरी पटरी से गुजरती हुई ट्रेन से टकराकर गिर गई ।पूरे 7 घंटों तक पटरी पर वह ऐसे ही पड़ी रही ।उनका पूरा शरीर निर्जीव हो चुका था! पर मानसिक रूप से यह जागृत थी। उनको लग रहा था कि जीवन का अंत निकट है ।चूहे उनके पैर को कुतर रहे थे।भागने की शक्ति उनके शरीर में नहीं आ रही थी।सुबह कुछ स्थानीय ग्रामीणों ने उन्हें देखा और उन्हें अस्पताल पहुंचाया।डॉक्टरों की टीम ने उनकी जान बचाने के लिए उनकी बाईं टांग को काटकर शरीर से अलग कर दिया था।बरेली के स्थानीय अस्पताल से लखनऊ मेडिकल कॉलेज होते हुए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान वह पहुंच गई थी ।चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा उन्हें दिखाई दे रहा था।फुटबॉल और वॉलीबॉल की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी का ऐसा भयानक अंत उन्हें मंजूर नहीं था। ऐसी भयानक स्थिति में भी बिस्तर पर पड़े हुए उन्होंने संकल्प लिया । कि हे ईश्वर तूने मुझे दिव्यांग बनाया है तो मैं यह चुनौती स्वीकार करती हूं ।

अब यह है दिव्यांग विश्व की सबसे ऊंची चोटी पर ही तुझे धन्यवाद देगी।सच्चाई तो यह है कि उन्होंने इस दुर्घटना से पहले कभी पर्वतारोहण के बारे में कल्पना भी नहीं की थी। जो भी कोई उनके इस संकल्प के बारे में सुनता था उनका उपहास उड़ाता। लेकिन उन्होंने लोगों की परवाह किए बिना अपने फैसले पर अटल रही।लेकिन उनके भाई ओम प्रकाश सिन्हा और पूरे परिवार ने उनका हौसला बढ़ाया। उनके संकल्प के प्रति उनके खोए हुए आत्मविश्वास को उनके भाई और परिवार ने भरोसे में लौटा दिया। अस्पताल से निकलने के बाद लोग आराम करना पसंद करते हैं।लेकिन इन्होंने अपने अधूरे जख्मों के साथ अपने सपनों को साकार करने के लिए प्रेरणा स्रोत बछेंद्री पाल के पास पहुंच कर उनसे मुलाकात की।और बछेंद्री पाल ने उनकी शारीरिक दशा देखी और उनका हौसला बढ़ाया उनकी पीठ थपथपा कर। और कहा कि 1 दिन तुम्हारा लक्ष्य तुम्हारे कदमों में होगा।तुम्हारा हौसला माउंट एवरेस्ट से कहीं बड़ा है। वह बछेंद्री पाल से मिलकर आत्मविश्वास से भर उठी और बिना समय गवाएं उनसे पर्वतारोहण के सारे गुण सीख लेना चाहती थी। प्रारंभ में उनको शारीरिक चुनौतियों ने कई बार निराश किया ।सामान्य पर्वतारोही 15 मिनट में जितनी चढ़ाई कर लेते हैं उनको 2 घंटे से भी अधिक समय लग जाता था।कई बार मन में हताशा भी पैदा हुई उनके। लेकिन अंत में जीत उनके हौसले की हुई। 21 मई 2013 को सुबह के 10:00 बज कर 55 मिनट पर आखिर वह घड़ी आ पहुंची।जब उनका संकल्प साकार हो गया। अरुणिमा सिन्हा एक दिव्यांग अपने संकल्प और दृढ़ निश्चय के बल पर दुनिया की छत पर खड़ी होकर तिरंगे का आलिंगन कर रही थी ।और वह चीख चीख कर दुनिया को बताना चाहती थी कि उन लुटेरों को उन्होंनेजवाब दे दिया है।जिन्होंने उनको एक अबला समझकर ट्रेन से बाहर फेंक दिया था ।पूरे विश्व को यह दिखा दिया कि हाथ पैर कटने से कोई दिव्यांग नहीं होता।वास्तव में दिव्यांगता तो एक मनोदशा है। उन्होंने अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बना लिया। सच में अगर आपकी इच्छा शक्ति इतनी दृढ़ है तो कोई भी बाधा आपके मार्ग को नहीं रोक सकती वह खुद इसका जीवंत प्रमाण है।

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