वैसे तो प्रकृति से हम जीवों को अलग नहीं कर सकते क्योंकि समस्त जीव जगत प्रकृति का ही हिस्सा है लेकिन प्रसंग की व्याख्या करने के लिये ऐसा लिखना पड़ा है। यह सिद्ध है कि समस्त ब्रह्मांड गतिशील है और इसीलिये परिवर्तनशीलता ही प्रकृति का वास्तविक धर्म है। प्रकृति में वही जीव जातियां अपने को बचाये रख सकती हैं जी प्रकृति परिवर्तन के साथ अपने को समायोजित रखने की क्षमता रखती हो, जो जीव जातियां इस कार्य में सफल नहीं हुई वो विलुप्त होती गयी और यह क्रम आगे चलता ही रहेगा, नये-नये जीव आयेगे और जायेगे। जैविक विकास के क्रम में मानव जाति ने प्रकृति के साथ सबसे अच्छा समन्वय स्थापित करने में सफलता पाई, यही वजह है समस्त प्राणि जगत में मानव जाति ही सबसे सर्वश्रेष्ठ है।
लेकिन वर्तमान समय में मानव को अपनी श्रेष्ठता के मद में इतना चूर हो गया है कि वह खुद को प्रकृति से बड़ा समझने की भूल कर बैठा है, वह प्रकृति के नियमानुसार चलने के बजाय प्रकृति को अपने हिसाब से चलाने की मूर्खता कर रहा है। इस मूर्खता के दुष्परिणाम समस्त मानव जाति को भुगतना पड़ेगा, जो हमारी आंखों के समक्ष अब दृष्टिगत होने शुरु हो गये हैं।
ये सृष्टि पांच अवयवों से मिलकर बनी हैं- 1- पानी,2- आग, 3- हवा, 4- आकाश, 5- धरती इस धरती के दो स्थान भूलोक और पाताललोक । ये सृष्टि जीवन दायिनी तभी तक है जब तक इन पंचतत्वों में समन्वय स्थापित है, जैसे ही इन पंचतत्वों में संतुलन बिगड़ा वैसे ही प्रकृति जीवनहंता बन जाती है। आज की स्थिति यह है कि मनुष्य ने विकास व विज्ञान के नाम पर, पंचतत्वों के संतुलन पर आघात किया है। यदि हम जल की बात करें तो हम जानते है कि जल संतुलन कयी बातों पर निर्भर करता है- समुद्र, पहाड़, मैदान, मानसून व बरसात आदि। आज जल संकट की स्थिति मुंह बाये खड़ी है, समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है, धीरे-धीरे वह समय आ रहा है जब जीवन देने वाला जल समस्त स्थल भाग को अपने आगोश में ले लेगा और जीवन हंता बन जायेगा। वहीं दूसरी ओर पहाड़ जो वायुमंडल की आद्रता को अवशोषित करके झरनों के माध्यम से अविरल बहने वाली जीवनदायिनी नदियों को बहाते हैं और भूमिगत जलधाराओं का निर्माण करते है, इन्हीं जलधाराओं के जल को हम अपनी आवश्कताओं की पूर्ति करते हैं, पहाड़ो पर अतिक्रमण से इस प्राकृतिक व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ा है, मैदानी क्षेत्रों में बारिश भूमिगत जल को रिचार्ज करती है लेकिन विकास के नाम पर किया जा रहा अतिक्रमण भूमि की जल अवशोषण क्षमता कम कर रही है। लातार वनस्पतियों को नष्ट किया जा रहा है, कृषि की प्राकृतिक व्यवस्था की जगह वैज्ञानिक व्यवस्था लादी गयी है। मेरे कहने का मतलब है कि मानव जाति ने पंचतत्वों के संतुलन को बिगाड़ दिया है, बाढ़, सूखा, भूकंप, ज्वालामुखी, भयानक बीमारियाओ के रूप में, बहुत जल्द ही, ये पंचतत्व, समस्त प्राणि जगत के समक्ष खड़े होगे।
यह लेखक के स्वयं के विचार हैं। रवि उमराव ( जैविक खेती प्रमोटर, फाउंडर- एसपीएल ग्रामीण उत्थान समिति, कानपुर, उ.प्र., डायरेक्टर- अयाना.फूड & आर्गेनिक्स)