कंगना को पहली मर्तबा, 2006 में फ़िल्म गैंगस्टर में देखा गया था, फ़िल्म भट्ट कैंप के ही मुताबिक , उसी के मानकों पर उतरती हुई दर्शकों के दिल मे भी उतरी थी , साथ ही उतरी थी कंगना की दुस्साहसी छवि। ये उनकी मासूमियत और बेझिझक,  समर्पित संघर्ष का ही नतीजा था कि फ़िल्म के कई दृश्यों में वो मोम जैसी सफेद टांगों के साथ नज़र आते हुए भी फ़िल्म के साथ चल रही कहानी से दर्शकों को जोड़े रखने में पूरी तरह कामयाब रहीं । बेशक महेश भट्ट ने अपनी रुचि और नारी सौंदर्य के प्रति अपने आदिम प्रयोगधर्म को कंगना के ऊपर भी लागू किया , पर कंगना की, प्रेम में धोखा देती ,प्रेम में धोखा खाई  नशेड़ी की निर्दोष एक्टिंग ही थी जो पर्दे पर सिक्के उछलने के बजाय दर्शक अभिभूत हो उठे। सोलह बरस की कंगना ने मैच्योर्ड बार गर्ल की भूमिका के साथ न्याय किया।

फ़िल्म में जितने भी हिंसा, शराब, चुम्बन , सैक्स के दृश्य रहे हों, मगर फ़िल्म उस दुखांत के लिए भी याद की जाएगी जब गैंगस्टर हाथ मे सिंदूर लेकर कंगना के पैरों पर दम तोड़ देता है।  कंगना का उस दृश्य में साकित रह जाना, पछतावे और ग्लानि से गल उठने का निःशब्द अभिनय ही था , जिसे भारतीय दर्शकों ने हाथों हाथ सहानुभुति से लिया।

हीरो साबित हुईं कंगना…….

वो लम्हे में परवीन बॉबी का किरदार जितनी साफ़गोई और लगन से निभाया , उतना काफी था फ़िल्म जगत का कच्चा चिट्ठा सामने रख देने के लिए , लाइफ़ इन मेट्रो जैसी मल्टी स्टारर फ़िल्म हो या शकालाका बूम बूम जैसी थके हीरो के अपोजिट कंगना का खूबसूरत अवतार …. फैशन की बिगड़ैल , मज़बूर नशे की आदी टॉप क्लास मॉडल हो या राज द मिस्ट्री की प्रेतात्मा पीड़ित लड़की …… हर जगह कंगना की बोल्ड छवि और नॉन फिल्मी बैक ग्राउंड को भुनाया ही गया। हर जगह जितने कपड़े उतरने थे, उससे ज्यादा उतार दिए गए पर कंगना की ही ताक़त थी या हमारे सिने दर्शकों का प्यार , जो कंगना के लिए जेब से खर्च कर हॉल तक जाता था।

काइट्स ही थी वो फ़िल्म जहाँ उसे रितिक जैसा फिल्मी बैकग्राउंड से आने वाला लड़का दोस्त के तौर पर मिला जिससे एक काल खंड में प्रेम भी किया । काइट्स जितनी असफल फ़िल्म साबित हुई , इन दोनों की प्रेम कहानी उतनी ही सफल हुई। हालांकि सफल फ़िल्म कृष 3 तक आते आते दोनो ही टूट चुके थे। कंगना ने वन्स अपॉन आ टाइम,  नॉक आउट, तनु वेड्स मनु , तेज़,डबल धमाल, शूट आउट एट वडाला, रज्जो , क्वीन, रिवॉल्वर रानी, उंगली, कट्टी बट्टी, आई लव ny, रंगून, पंगा, जैसी कई फिल्में कीं। जिसमे दर्शको ने बखूबी उनका अभिनय मन्जता हुआ देखा। अधिकांश को दर्शकों ने प्यार दिया, जिनको प्यार नहीं दिया उन्हें लताड़ा भी। क्योंकि ये पब्लिक है , जीते जी चढ़ाती है तो उतारती भी है । मगर आज की पब्लिक बौरा गयी है । उसने अफीम की सस्ती खेप चढा ली है।

कंगना की सिर्फ एक फ़िल्म की वजह से उसे झांसी की रानी करार दे देना प्यार देना नहीं है , बल्कि बावला हो जाना है । लोग क्यों भूल जाते हैं झांसी की रानी इतनी ब्यूटी प्लस जैसी झकाझक , नहीं हो सकती। इतनी गोरी रानी? मैं पूछती हूँ यही आपकी रानी , रज्जो में खटिया छाप डांस भी कर चुकी है, जिसके लिए आप तीन दशक गुजरने के बाद भी करिश्मा को माफ नही कर सके । आज भी सरकाय लेओ खटिया गाने से पहले देखना पड़ता है पापा तो नही आ गए। आपकी रानी , खुलेआम गांजा ,चरस अफीम कोकीन यहां तक कि कॉफी तक पीती दिखाई गई है , तो कैसे अनदेखा कर पाते हैं आप?

यार अब आपकी रानी ने उर्मिला मातोंडकर को सॉफ्ट पोर्न स्टार कह डाला, आपकी रानी बचकानी हुई जा रही है और आप प्रजा होकर चिंतित नहीं हैं। उर्मिला मातोंडकर जिसके चेहरे का नमक , जिसकी आंखों का पानी जिसकी कमर की फुर्तीली लचक सोना थी , तो उसकी आवाज़ में घुली कमसिनी सुहागा…. हम में से कितने ही लोग उस दौर में बड़े हुए हैं जब उर्मिला और करिश्मा के कंधों पर ही चुहिया दौड़ बनाये रखने का जिम्मा था , याद होगा  सबको  उर्मिला की फिल्मों का जलवा ।

रंगीला, चमत्कार , जुदाई, दौड़, अफलातून,सत्या, मस्त, दिल्लगी,खूबसूरत, जानम समझा करो,जंगल, भूत, प्यार तूने क्या किया, पिंजर, तहज़ीब, एक हसीना थी ……इन फिल्मों के जादू से कोई बच पाया हो तो आकर बताए… कहाँ था इन हाइली नोटिफाइड फिल्मों में पोर्न का तड़का? कहाँ थी आह ओह की आवाज़ जो असहज करती हो दो पीढ़ियों को साथ बैठने में। कहां थी जल्दी कपड़ों से छुटकारा पाकर टूट पड़ने की भूख , जो चैनल बदला हो कभी किसी ने ।

……….. क्या कह दिया कंगना ने यह? और जनता जनार्दन उस पर भी लुभेयाये जा रहे हैं, भक्त जनों , कंगना एक बाकमाल एक्ट्रेस है, टिकी हुई है , हिम्मती है , मगर महत्वाकांक्षा का ओवर लोड हो चुका है , उसे नहीं पता कि उसने क्या कहा है, आप महत्वाकांक्षी नहीं हैं मैं जानती हूं, सब्जी खरीदते वक्त जुगाड़ में रहते हैं कि कैसे धनिया फ्री मिले , या कैसे जो बचा खुचा है उसे बचाए रखें, तो आपका बुद्धि विवेक सब सलामत है अभी, ऐक्ट्रेस को एक्ट्रेस की जगह रखें। उनके निजी जीवन मे उन्होंने कोई कारनामा अंजामनहीँ दिया जो जनहित , मानव समूह के हित में हो। वो बचपन मे गुड़िया के बजाय गन से खेलना चाहती थीं, विद्रोही थीं, होना भी चाहिए उनके विद्रोह ने हमें कंगना राणावत दी और अक्षय कुमार को एक खूबसूरत कॉम्पटीटर मिलने वाली है।

मगर उनका  विद्रोह अअनुशाषित सा है ,कोई अनुशासन नहीं है उनके बयानों में , कोई भाषा और सम्मान बोध नहीं है उनकी बातों में । क्या ऐसी चीजें ध्यान या कान देने लायक हैं? ऐसे विद्रोह ऐसे विरोध सर पर उठाने के बजाय गुज़र जाने तक सहजता से रहना ही आज का ज्ञान है साधो।

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