विज्ञापन और बिजनेस के लोभ में व्यवस्थाओं की चाटुकारिता में मशगूल निर्लज्ज मीडिया की भेंट चढ़ गया एक और व्यक्ति। तन्त्र की खामियां को छिपा कर पॉजिटिव हिस्से की खबर उठाकर दिन रात फ्लैश कर भारत को विश्वगुरु बताती मीडिया की करतूते किसी से छिपी नही है। पत्रकारिता के सामान्य सिद्धान्तो के विपरीत विशुद्ध उद्योगपतियों की भूमिका में आ चुकी मीडिया को मीडिया कहने तक मे शर्म आने लगी है। क्या वह वही मीडिया है जिसने स्वतंत्रता के समर में चोरी छिपे अखबार छाप छाप कर लोगो मे बांट कर लोगो को ब्रिटिश हुकूमत की सच्चाई से रु ब रु कराकर ब्रिटेन सरकार की नींव हिला दी थी?

जी हां, यह वही मीडिया है लेकिन इसे चलाने वाले लोग वे राष्ट्रवादी नही है बल्कि आज २१ वीं सदी की उनकी उद्योगपति सन्ताने है जिनके हृदय में मानवीय सम्वेदनाएँ और देश प्रेम शून्य हो चुका है। वे देश के हित और लोगो के हित से कोई मतलब नही रखते और न ही अपने बुजुर्गों के सिद्धांतों को मानते है, वे सिर्फ कागज के नोटो के लिए अपना उद्योग चमका रहे हैं।

नए नए लौंडे न्यूज़ चैनल से टाइम स्लॉट लेकर व्यवस्थाओं के गुणगान करने के लिए डिबेट के रूप में विज्ञापन बांचने चले आते है जबकि जो असली वाले पत्रकार है, कलम के सिपाही है उन्हें आज कोई जानता तक नही है। इन सभी वरिष्ठ पत्रकारों के अस्तित्व, प्रभाव और सिद्धांतों को चंद प्रोफेशनल चाटुकारों की फौज ने पूरी तरह आच्छादित कर दिया है, सो आज वे तन्हाई काट रहे हैं।

बताया जाता है कि आज एक मीडिया कर्मी Manoj Mishra ही यूपी के स्वास्थ्य सिस्टम की भेंट चढ़ गये है, जो जी न्यूज में वरिष्ठ कैमरामैन थे। मीडिया हाउस उधर जिस व्यवस्था के चरणों मे दण्डवत लोट कर जब भक्ति रस में गोते लगाने में व्यस्त था, यहां तब उसी व्यवस्था के कारण उसके एक सिपाही ने सुबह दम तोड़ दिया था।

मुझे शोशल मीडिया में मित्रो की वाल पोस्ट से ही इस घटना की जानकारी हुई। पता चला कि ०५ दिन पहले इनकी तबियत खराब हुई। इन्हें विवेकानंद हॉस्पिटल ले जाया गया। वहां से घर डिस्चार्ज कर दिया गया। तबियत फिर खराब हुई, तब पूरे लखनऊ के असपतालो के चक्कर काटें गये। अधिकारीयों से लेकर मंत्रीयों तक फ़ोन और सहायता मांगी गई, लेकिन ना कोई अस्पताल मिला जिसने भर्ती किया हो और ना उचित इलाज।

आरएमएल में जैसे तैसे भर्ती किया गया। नतीजा यह हुआ कि उनको ऑक्सीजन तक नहीं मिल पाई। परिणामतः मनोज आज तड़के दम घुटने से तड़प कर अलविदा कह गये।

इतना बड़ा चैनल, इतने बड़े पत्रकार, इतनी बड़े सूबे के इतना बड़ा स्वास्थ्य महकमा सब धराशायी हो गया, कोई किसी काम का नही निकला, आम आदमी की बिसात ही क्या।

परिवार वालो को उनके मृत हुए लोगो की लाशें ही तमीज से दे दें, वही बहुत बड़ी बात है।  मृत्यु प्रमाण पत्र देने के लिए अर्धमूर्छित होना तय है।

कमियां और अच्छाइयां हर तन्त्र, हर सरकार, हर काल और हर दशा में होती है। ऐसे में हमारा दायित्व है कि अगर हम अच्छे पहलू दिखा रहे है तो बुरे और कमजोर पहलू भी छूटने नही चाहिए ताकि जनदबाव और जिम्मेदारी समाप्त ना हो सके।

यह घटना किसी के साथ भी हो सकती है, हम हों चाहे आप। अगर केसेस बढ़ रहे हैं, लोड अधिक है तो भी व्यवहार ऐसा नही होना चाहिए कि किसी की जान ही चली जाये। खुद को इस जगह रखकर व्यथित महसूस करना स्वाभाविक है।

जब कमजोर पहलू नजरअंदाज किये जाते है तभी मनमानी और मठाधीशी की शुरुआत होती है। जैसा मुझे पता चला अगर यह सत्य है तो इसकी जांच करते हुए सम्बन्धितों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही अपेक्षित है। यदि सुविधाओ और संसाधनों में कोई कमी है या सुधार की आवश्यकता है तो उसे ठीक किया जाना चाहिए।

मीडिया में ज़मीर जिंदा हो तो अपने १०० प्रतिशत में १० प्रतिशत जनता को अवश्य दें, अन्यथा भगवान ही मालिक है।

लेखक निखलेश मिश्रा

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