डॉ0वी0के0सिंह। (वरिष्ठ खोजी पत्रकार)

उत्तर प्रदेश। गाजियाबाद। वैसे तो आज से कई दसक पूर्व मूर्धन्य(विद्वान) कथाकार, मुंशी प्रेम चन्द ने आज के भारत के परिपेक्ष में लिखा था, तनख्वाह तो पूनम का चाँद होती है जो माह में सिर्फ एक ही दिन पूरी दिखती है जबकि, रिस्वत खुदा की वो नेमत होती है जो, दिन दूनी व रात चौगुनी बरसती है।। और निश्चय ही, मुंशी प्रेमचंद की उक्त पंक्तियों को उत्तर प्रदेश पुलिस ने गहराई तक अपने जीवन मे आत्मसात कर लिया है, जिसके परिणामस्वरूप विकास दुबे जैसे समाज, कानून एव राष्ट्रद्रोही पैदा होते हैं। गाजियाबाद थाना विजय नगर क्षेत्रान्तर्गत श्रमजीवी पत्रकार विक्रम जोशी को कुछ बदमाशों ने उनका रास्ता रोककर गोली मार दी, जिसको अधिकाँश पत्रकारों ने बदमाशों के बढ़ते हौसले की तारीफ में कसीदे पढ़े जबकि, सामाजिक विद्वानों की माने तो, श्रमजीवी पत्रकार पर बदमाशों द्वारा गोली मारना, बदमाशों के बढ़े हौसलों का प्रतीक नहीं बल्कि, बदमाशों से मिलने वाली रिस्वत, एव महँगे तोहफों ने, इन्हें नपुन्सक बना दिया है। विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, ज्ञात हुआ है कि, पत्रकार विक्रम जोशी ने थाना विजय नगर में उक्त गोली काण्ड की घटना से लगभग 3 दिवस पूर्व, उसके विरुद्ध होने वाली अप्रिय घटना के बारे में आशंका जताते हुये, थाना विजय नगर में लिखित शिकायत पत्र दिया था किन्तु, कदाचित जोशी को स्वः पत्रकार होने का भृम रहा होगा, इसलिये निश्चय ही उसने उचित कार्यवाही करवाने हेतु, पुलिस को रिस्वत नहीं दी होगी, जबकि, उत्तर प्रदेश पुलिस का इतिहास सदा से, कमजोर ईमानदार के प्रति उदासीन जबकि ताकतवर अपराधी के प्रति संवेदनशील एव उदारवादी रहा है। कदाचित इसीलिये, पत्रकार द्वारा थाना विजय नगर गाजियाबाद को सौंपी गई लिखित शिकायत, थाना विजय नगर की ही कचरा पेटी में पड़ी अपनी बर्बादी पर आँसूं बहा रही होगी। फिर भी, उत्तर प्रदेश में सुशासन है, भले ही लॉ एंड आर्डर के नाम पर, उत्तर प्रदेश पुलिस की वर्दी सही को गलत एव गलत को सही कर, प्रदेश भर में हजारों विकास दुबे जैसे दुर्दान्त अपराधी पैदा कर, लाखों करोड़ों के वारे न्यारे कर रही है। प्रायः यह देखने एव सुनने को मिलता है कि, समाज द्रोहियों के विरुद्ध पत्रकार के द्वारा दिये गये शिकायती पत्र, थानों की कचरा पेटी में पाये जाते है जबकि, पत्रकार के विरुद्ध दिया गया कोई भी शिकायत पत्र, पत्रकार को बड़े से बड़ा अपराधी बनाने के लिए पर्याप्त है, अर्थात पत्रकार के विरुद्ध बिना किसी साक्ष्य एव बिना किसी जाँच के, भा0द0सहिंता की कठोर धाराओं में अभियोग पंजीकृत कर, कार्यवाही करवाने के लिए पर्याप्त है, फिर चाहें पत्रकार के विरुद्ध शिकायती पत्र देने वाला, गाजियाबाद पुलिस अभिलेखों में दर्ज उच्च कोटि का अपराधी ही क्यों न हो? वजह, ये अपराधी ही तो हैं जो, गाजियाबाद पुलिस के कई निम्न एव उच्च स्तरीय अधिकारियों के बीबी बच्चों का भरण पोषण के साथ साथ, उन्हें महँगे गिफ्ट भी दिलाते हैं। बहराल, *ये बात तो सच ही है कि, तनख्वाह पूनम का चाँद है, और रिस्वत खुदा की नेमत, जो दिन दूनी एव रात चौगुनी होकर, गाजियाबाद ही नहीं अपितु, उत्तर प्रदेश के कई छोटे, मोटे एव मझोले अधिकारियों पर बरस रही है। कथा लिखने तक, सूत्रों के अनुसार, गाजियाबाद के यशोदा अस्पताल में,, पत्रकार विक्रम जोशी का इलाज चल रहा था तथा उनकी उपचार के दौरान मौत हो गई गंभीर ।पुलिस के उच्च अधिकारियों ने प्रताप विहार, चौकी प्रभारी का निलंबन कर अपने कर्तव्य का निर्वहन भी *कर लिया है।।

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