अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
रायपुर — राष्ट्रीय सेवा योजना बालिका इकाई डॉ खूबचंद बघेल शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय भिलाई 03 की कार्यक्रम अधिकारी डॉ० अल्पना देशपांडे ने पृथ्वी को वातानुकूलित करने की मुहिम छेड़ रखी है। जिसमें दिव्यांग पीपल, पकड़, बरगद, गूलर को दीवारों, छतों , गली ,नाली , नदी , तालाब , पुलिया , पुरानी मकानों एवं खंडहरों से बरसात के मौसम में जड़ सहित उखाड़ कर इन्हें पहले संरक्षित करती हैं उसके बाद नदी , तालाब , रोड के किनारे या जंगल में उसे रोपित कर देती है। उनका कहना है कि बरगद या पीपल के वृक्ष लगाने से वातावरण वातानुकूलित हो जाता है , उर्जा बढ़ती है , वाटर लेवल को ऊपर लाने में सहायक होता है। इसके पत्ते मोटे होते हैं जिससे गर्मी में ठंडा और ठंड में वृक्ष के नीचे खड़े रहने से गर्मी महसूस होती है। एक बरगद वृक्ष से 500 साल तक पक्षियों का भंडारा चलता है , पक्षी बरगद की फली खाते हैं जो पौष्टिक हैं। बरगद पर ही पक्षियों घोंसला होता है और प्रसव गृह पक्षियों के लिये बरगद ही अस्पताल है जहांँ पक्षी स्वयं अपना घर, बिस्तर बनाती है एंव अंडा देकर बच्चे को पालती है। प्रकृति और मानव दोनों एक दूसरे के पूरक है। पेड़ पौधे हमारे खान-पान से लेकर बीमारियों को दूर करने में सहायक होते और ऑक्सीजन देते हैं जिससे वातावरण शुद्ध एवं वातानुकूलित होता है। बरगद के पेड़ के सभी भागों जैसे जड़, तना, पत्तियांँ, फल, और छाल को औषधीय उपयोग में लाया जाता है इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट सूजन घटाने वाला और एंटीमाइक्रोबियल् बैक्टीरिया को नष्ट करने वाला प्रभाव कई तरह के औषधि लाभ पहुंँचाता है। वे स्वयं ऐसे दिव्यांग पौधों को संरक्षित कर रही है और इसके साथ ही सरकार से भी ऐसी योजनायें अस्तित्व में लाने की इच्छा जतायी है।