कोई नहीं मिलता है, जो बाँट ले दर्द मेरा । मतलब से मिलने वाले इंसान बहुत हैं ।। जब कोई सेलिब्रिटी या अमीर आदमी आत्महत्या करता है तो, अखबारों और न्यूज़ चैनलों पर दिन भर आत्महत्या की खबर चलती रहती है, जांच टीम गठित होती है,और आत्महत्या के कारणों पर बारीकी से जांच होती है, पूरे देश में शोक मनाया जाता है, और गरीब मध्यवर्गीय की मौत की खबर को किसी अखबार के कोने में भी जगह नहीं मिलती , खानापूर्ति के लिए रिपोर्ट लिखी जाती है, और फाइल बंद कर दी जाती है, कभी हमने यह विचार नहीं किया गरीब मरता है, बेरोजगारी ,आर्थिक तंगी और रोटी के लिए, परेशानियों से जूझता रहता है, हताशा और निराशा के कारण उसके पास सिर्फ एक ही रास्ता बचता हैं, मौत को गले लगाना, ऐसी मौतों को किसी धर्म में अच्छा नहीं माना गया है और कहां जाता है ,ऐसे व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त नहीं होता । हमारे देश में हर 2 घंटे में 3 बेरोजगार कर रहे हैं खुदकुशी । अलीगढ़ की घटना जिसको सुनकर आंखों से आंसू निकल जाते हैं ,बेबस पति आर्थिक तंगी के कारण पत्नी की तकलीफ नहीं देख पाया और दर-दर भटकता रहा घिसटता रहा ,कागज रूपी नोटों के लिए, दिल नहीं पसीजा किसी का मौत को गले लगाने से पहले रोता रहा । बीमार पत्नी दर्द से कररहाती रही, हर चीख में एक ही आवाज आ रही थी मुझको बचा लो मेरा इलाज करवा दो, बेबस पति कभी अपनी जेब टटोलता तो कभी अलमारियों को खंगालता ,शायद इसमें कुछ पैसे मिल जाए जब जब जेब में हाथ डालता तो जेब से निराशा ही बाहर निकलती पड़ोसियों के दरवाजों पर मदद की गुहार लगाई पर किसी का दिल नहीं पसीजा , ना उम्मीद होकर घर पर आया और अप्राकृतिक मृत्यु को गले से लगाया,उस से पत्नी की तकलीफ देखी नहीं जा रही थी ,गले में फांसी का फंदा लगाकर खुद को लटका लिया । यह घटना अलीगढ़ की है, कोरोना महामारी में बेरोजगार हो गया और आर्थिक तंगी के कारण पत्नी के इलाज ना करवाने के मलाल में अपने जीवन को इस तरह समाप्त कर लिया । मुकेश कुमार (32) निवासी चंदनिया, क्वार्सी मजदूरी कर परिवार का पालन पोषण करता था,उसकी पत्नी गंभीर बीमारी से जूझ रही थी ,पत्नी के इलाज के लिए पैसों का इंतजाम नहीं कर सका और उसका ससुराल वालों से विवाद हो गया था, इससे आहत होकर उसने यह कदम उठाया, मृतक मुकेश के छोटे भाई बसंत ने बताया कि भाई पैसों के इंतजाम के लिए घर से निकला था,पर पैसों का इंतजाम नहीं हो पाया तो,वह दुखी मन से घर लौट आया था। इस कोरोना महामारी एवं लॉकडाउन ने गरीब एवं मध्यम वर्गीय परिवारो को आर्थिक रूप से तोड़ दिया है, बेरोजगारी इसका मुख्य कारण है,परिवारों में पैसे को लेकर विवाद एक आम बात हो गई हैं ,जिसके कारण आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही है ऐसी ही एक और घटना जो कानपुर की है ,आर्थिक तंगी की वजह से प्रिंस और चंद्रिका मे आए दिन झगड़ा होता था, घरेलू कलह से तंग आकर प्रिंस ने कमरे में खुद को बंद कर लिया और फांसी लगा ली,चंद्रिका ने पति को फंदे पर लटकता देखा तो उसने भी गले में फंदा डालकर आत्महत्या कर ली, जब परिजन मौके पर पहुंचे तो दंपति के शव अलग-अलग कमरों में लटक रहे थे, और 11 महीने के बच्चा कमरे के बाहर बैठा रो-रो कर मां के आने का इंतजार कर रहा था, जब मां नहीं आई तो फर्श पर घिसटता हुआ उस कमरे में जा पहुंचा जहां उसकी मां फंदे पर झूल रही थी,शवों को फंदे से उतार कर अस्पताल ले गए जहां डॉक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया । प्रिंस की लॉकडाउन में नौकरी छूट गई थी, बीते तीन महीनो से प्रिंस घर पर ही था, पिता सिक्‍युरिटी गार्ड की नौकरी करते है, इसके बाद भी वह बेटे और बहू की आर्थिक मदद करते रहते थे ,बेटे और बहू की मौत से बुजुर्ग पिता टूट गए हैं , वहीं 11 माह का मासूम अपनी मां को ढूंढता रहता है। बेरोजगारी एवं आर्थिक तंगी की वजह से आत्महत्या की प्रवर्ति बढ़ती जा रही है,अब किसानों से ज्यादा बेरोजगार लगा रहे हैं मौत को गले । नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने बेरोजगारी को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के डाटा के मुताबिक देश में बेरोजगारी की वजह से साल 2018 में औसतन 35 लोगों ने रोजाना खुदकुशी की थीं, इस तरह से हर 2 घंटे में लगभग 3 बेरोजगार खुदकुशी कर रहे हैं । लॉकडाउन के दौरान 300 लोगों ने आत्महत्या की थीं ,यह आंकड़े चौंकाने वाले हैं । बेरोजगारी ले रही हैं लोगों की जान ,नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार बेकारी और बेरोजगारी से तंग आकर खुदकुशी करने वालों की संख्या किसानों की आत्महत्या की तादाद से ज्यादा है ,साल 2018 में 12 हजार 936 लोगों ने बेरोजगारी से तंग आकर खुदकुशी की थी ,जबकि इसी अवधि में खेती-किसानी से जुड़े 10 हजार 349 लोगों ने आत्महत्या की थी । नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली संस्था है, और ये संस्था देश भर में अपराध से जुड़े आंकड़े और ट्रेंड जारी करती है । किस्सा सबकी जिंदगी का बस इतना सा है । जिंदगी बनाने के चक्कर में हम जीना भूल गए हैं ।।

संपादकीय रुद्र के साथ

लेखक मोहम्मद जावेद खान

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