परिवार के पाँच सदस्यों को जिन्दा जलाकर मार दिया गया।

कानून बनाम कानून के प्रहरी।

डॉ0वी0के0सिंह। (वरिष्ठ पत्रकार)

उत्तर प्रदेश। मैनपुरी। जिला मैनपुरी उत्तर प्रदेश में दिनाँक 18 जून 2020 को, एक ही परिवार के पाँच सदस्यों को दबंगों द्वारा जिन्दा जलाकर मारने का मामला प्रकाश में आया है। आग जलकर मरने वाले पाँच सदस्यों में एक 2 वर्षीय बच्चा भी शामिल है जो दुनियाँ में आया तो जरूर था किन्तु, दुनियाँदारी, दोस्ती, दुश्मनी, ऊँच नीच इत्यादि के भेदभाव से बिलकुल परे था, उसे क्या मालूम कि, उसने जिस दुनियाँ में स्वास लेने हेतु आँखे खोली है उसके वायुमंडल सिर्फ जहर ही जहर है। उसे क्या मालूम ज़ीरो टॉलरेंस ऑफ क्राइम का दम्भ भरने वाले प्रदेश के मुखिया, एक वर्ग विशिष्ट जो कि, सामाजिक, आर्थिक एव राजनीतिक रूप से ससक्त समुदाय के मुखिया है जो एक बच्चे को जिन्दा जलाकर मारने वालों के विरुद्ध कार्यवाही करवाने में असमर्थ है और कदाचित मुख्यमंत्री कार्यवाही करवाना भी चाहे तो भी, समाज एव सरकार की प्रहरी पुलिस अनैतिक धन के लालच में कानून को धोबी पछाड़ लगाकर, चारो खाने चित्त करने में सक्षम है, और निश्चय ही जब समाज, सरकार एव कानून की प्रहरी पुलिस किसी अपराधी के पक्ष में, कानून के विरुद्ध धोबी पछाड़ का दाँव लगाकर, कानून को चारों खाने चित्त कर देती है तब, छोटे से अपराधी का मनोबल प्रबल होता है और, विकास दुबे जैसे दुर्दान्त अपराधी का जन्म होता है, फर्क इतना है, भले ही उत्तर प्रदेश पुलिस एव एसटीएफ ने, कानपुर वाले विकास दुबे की योजनावद्ध तरीके से एनकाउन्टर के नाम पर हत्या की है, बहराल सम एव विषम, दोनों ही परिस्थितियों में हत्या तो कानून की ही हुई है। वैसे भी, देश व प्रदेश का कानून कुछ भी हो किन्तु, पुलिस सरकार द्वारा प्रदत्त वर्दी एव संविंधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों का दुरुपयोग कर, सही को गलत, एव गलत को सिद्ध करना बेहतर जानती है। ऐसा प्रायः देखा गया है कि, कानून एव पुलिस की लड़ाई में जीत, पुलिस की ही होती है चूँकि, हमारे देश मे न्याय पाने के लिये सक्षम होना नितान्त आवश्यक है, दाल रोटी की लड़ाई लड़ने वाले गरीब मजदूरों को न्याय की बात करना भी वर्जित है, वर्ना क्या वजह हो सकती है कि, दम तोड़ती महिला ने, मैनपुरी प्रशासन के सामने स्थानीय दबंग संजय सिंह का नाम जिन्दा जलाने वालो में लिया किन्तु, मैनपुरी पुलिस पीड़िता के बयान को नजर अंदाज कर इतने बड़े सामूहिक हत्याकाण्ड के जिम्मेदार संजय सिंह को साफ बचा लेती है। आखिर मैनपुरी, के पुलिस कप्तान एव स्थानीय पुलिस प्रशासन को, जिन्दा जलाने वाले अभियुक्तों से क्या संबंध है, उच्च स्तरीय जाँच का विषय है? चूँकि, पाँच सदस्यीय मृतक परिवार गरीब मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार परिवार से हैं, और गरीब किसी को मैला पैजामा हिलाने के सिवाय कुछ दे ही नहीं सकता है, फिर ऐसे गरीब परिवार के लिए तो समूचे राज्य का न्यायतंत्र वातानुकूलित कार्यालय में बैठकर न्याय कर ही देता है, अब न्याय कैसा होता है? सामाजिक विद्वान बेहतर समझते है।

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