अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट रायपुर — हिन्दू धर्म मे आज आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी महत्वपूर्ण तिथि होती है जिसे देवशयनी एकादशी , पद्मा एकादशी , आषाढ़ी एकादशी , पद्मनाभा या हरिशयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रानुसार श्री नारायण ने एकादशी का महत्त्व बताते हुये कहा है कि जिस प्रकार देवताओं में श्री कृष्ण, देवियों में प्रकृति, वर्णों में ब्राह्मण तथा वैष्णवों में भगवान शिव श्रेष्ठ हैं , उसी प्रकार व्रतों में एकादशी व्रत श्रेष्ठ है। इस दिन भगवान विष्णु शयन अवस्था में चले जाते हैं दूसरे शब्दों में आज से देवप्रबोधिनी एकादशी तक भगवान विष्णु पाताल लोक में निवास करते हैं। आज के दिन से चातुर्मास भी प्रारंभ होता है। आज से भगवान विष्णु पृथ्वी का कार्य भगवान शिव को सौंप देते हैं और भगवान शिव चातुर्मास में पृथ्वी के सभी कार्य देखते हैं इसलिये चातुर्मास में भगवान शिव की उपासना को विशेष महत्व दिया जाता है। चूकि माँगलिक कार्यों को पूर्ण करने के लिये देवताओं के आशीर्वाद की जरूरत होती है। जगत पालक श्रीहरि के योग निद्रा में जाने के बाद देवगणों का विश्राम मान लिया जाता है। इस कारण आज के बाद हिन्दू धर्म में विवाह , उपनयन संस्कार ,गृहप्रवेश , भूमिपूजन सहित अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। यह कार्य देवोत्थानी एकादशी तक जारी रहेगा , इस दिन भगवान श्रीहरि सहित सभी देवता जागते हैं , इस तिथि को तुलसी विवाह का आयोजन होता है और लग्न मुहूर्त शुरू होते हैं। हमारे धर्म ग्रंथों में चातुर्मास की महिमा का विषद् गान किया गया है।चातुर्मास्य शब्द सुनते ही उन सभी साधु-संतों का ध्यान आ जाता है। चातुर्मास सन्यासियों द्वारा समाज को मार्गदर्शन करने का समय है। संत , महात्मा , सन्यासी इस चार मास एक ही स्थान पर रहकर साधना करते हुये लोगों को धर्म संबंधी ज्ञान उपलब्ध कराकर सत्य पर आधारित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। चातुर्मास्य आषाढ़ शुक्ल एकादशी (इसे देवशयनी या हरिशयनी एकादशी भी कहते हैं) से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी या देवोत्थान एकादशी) तक होता है। सनातन धर्म में चातुर्मास्य की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है, जिसका अनुकरण आज भी हमारे साधु-संत करते हैं। इन विशेष दिनों में सिर्फ व्रज की यात्रा करने का विधान है, क्योंकि इन चार महीनों के लिये भूमण्डल के समस्त तीर्थ व्रज में ही आकर निवास करते हैं।
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