आदर्शवाद और यतार्थवाद में कोई बुनियादी और आवश्यक विरोध नहीं है। एक सच्चा आदर्शवादी दीर्घकालीन लक्ष्यों के पीछे भागने के बजाय जो संभव है उसके लिए आवश्यक संसाधनों को संगठित करने का प्रयास करता है। आदर्श यथार्थवाद को मूर्तरूप देने वाली अनेको महान ऐतिहासिक विभूतियां ने स्वराज के रक्षाव्रत में अपना योगदान दिया। सही मायने में ये सभी विभूतियां हिन्द स्वराज के ध्वजवाहक के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
मराठा परिसंघ के इतिहास मे महानता के ऐसे अनेकों उदाहरण मिलते है जो किसी भी कालखंड मे सर्वथा दुर्लभ हैं। शिवाजी महाराज से लेकर सयाछी राजे तक, इतिहास महानता के किस्सों से भरा हुआ है। समता, समरसता और स्वतंत्रता जैसे मानवीय मूल्यों को इस कालखंड मे, समाज के निचले पायदान तक प्रतिस्थापित किया गया था। न्याय और धर्म की रक्षा मराठा परिसंघ के हर शासक की सर्वोच्च प्राथमिकता रही। इसके लिए हिन्द स्वराज के उन ध्वजवाहकों ने कभी कोई समझौता नहीं किया।
19-फरवरी-1630 को जब छत्रपतिशिवाजी महाराज का जन्म हुआ तब उस वक्त उत्तर भारत में मुगल सत्ता का वर्चस्व अपने चरम पर था। यही नहीं, दक्षिण भारत में भी हैदराबाद (निजामशाही) और बीजापुर (आदिलशाही) नए शक्तिकेंद्रों के रूप में उभर रहे थे। इन सभी का आतंक अपने चरम पर था। हिन्दू जनता पर आए दिन झुल्म ढाए जाते थे। उनके सम्मान और गौरव को गहरी ठेस पहुँचाई जा रही थी। संभ्रांत लोग किसी तरह से इन शासकों को अपनी सेवाएँ देकर अपना जीवन यापन कर भी ले रहे थे, मगर, गरीब किसान और मजदूरों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी।
ऐसी स्थितियों में भी मात्र 14 वर्ष की अल्पायु में शिवाजी महाराज ने अपनी माता जीजाबाई की प्रेरणा से स्वराज स्थापना का दुश्कर व्रत लिया। उस समय उनके पास आदिलशाही के अधीन एक छोटी सी जागीर थी। ऐसी परिस्थिति में, स्वराज एक दिवा स्वप्न सा था।
मगर फिर भी शिवाजी महाराज ने एक दीर्घकालीन योजना बनाई और जरूरी संसाधनों को इकट्ठा करना सुरू कर दिया। उन्होंने लोगों में आत्मगौरव और आत्मसम्मान का भाव जगाया। स्वतंत्रता प्राप्ति केलिए परस्पर सम्मान, सहयोग और समरसता का महत्व समझाया। लोगों को संगठित और प्रशिक्षित करने के साथ ही उनके अंदर मानवीय मूल्यों का भी संचार किया। स्वराज का हर एक सैनिक मानवता का प्रहरी भी था। छापामार (गमिनी-कावा) युद्धनीति को अपनाकर उन्होंने अनेकों किलो पर अधिकार कर लिया।
पुरंदर की संधि (1665 ई.) और फिर आगरा की कैद से मुक्ति (1666 ई.) ने छत्रपति शिवाजी महाराज को सिंहासन निष्ठा के प्रति संवेदनशील बनाया। हलांकि स्वराज एक गणतांत्रिक व्यवस्था के रूप में विकसित हुआ था फिर भी लोगों के अंदर सिंहासन निष्ठा का भाव जगाने केलिए उन्होंने (1674 ई.)
छत्रपति की उपाधि धारण की। वह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के महत्व को अच्छी तरह समझते थे। अपने राज्य का विस्तार भी उन्होंने इसी बात को ध्यान में रखते हुए गुजरात से लेकर जाफना (श्रीलंका) तक किया। इस क्षेत्र में विदेश-व्यापार के अनेक केंद्र थे। इनसे मिलने वाले राजस्व के कारण ही उन्होंने किसानों से लागान लेने पर रोक लगा दी थी। वह लोगों की आर्थिक उन्नति के महत्व को भलीभाँति समझते थे। सर्व-साधारण तक जीवनोपयोगी संसाधनों की व्यवस्था केलिए आर्थिक सशक्तीकरण पर उन्होंने विशेष ध्यान दिया।
आर्थिक आत्मनिर्भरता लोगों के सामाजिक शोषण को रोकने में भी सहायक सिद्ध हुई। प़त्येक महिला और पुरूष के सम्मान और गौरव की रक्षा छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज की व्यवस्था का प्रमुख अंग थी।
उनके बाद, छत्रपति शंभाजी महाराज, छत्रपति राजाराम और महारानी ताराबाई ने स्वराज के रक्षाव्रत को पूरी निष्ठा से निभाया। इन स्वराज संरक्षकों ने दक्षिण में राज्यविस्तार के औरंगजेब के मंसूबों को कभी परवान नहीं चढने दिया। उसकी मृत्यु के बाद छत्रपति शंभाजी महाराज के पुत्र शाहूजी ने सतारा को अपनी राजधानी बनाकर स्वराज को विस्तार दिया। मराठा परिसंघ भारत की प्राकृतिक सीमाओं तक फैल चुका था। अटक से लेकर कटक तक और हरिद्वार से रामेश्वर तक।
साशनतंत्र को सुचारु रूप से चलाने के लिए मराठा परिसंघ में नागपुर, पुणे, बड़ौदा, इंदौर और ग्वालियर में स्वायत्त केंद्र बनाए गए। इस दौरान भारत से इस्लामिक वर्चस्व तो समाप्त हो गया मगर पानीपत (1761 ई.) में अफगान आक्रांता अहमदशाह अब्दाली के साथ युद्ध में मराठा परिसंघ को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इतिहास की सबसे बड़ी जनहानि के बाद भी मल्हारराव होल्कर और महदजी सिंधिया के नेतृत्व में मराठा शक्ति ने एक बार फिर से (1771 ई.) पूरे देश में भगवाध्वज फहरा दिया।
महारानी अहिल्या बाई होल्कर और महदजी सिंधिया ने स्वराज को नया रूप दिया। उन्होंने लोगों की शिक्षा और सांस्कृतिक विकास के विशेष प्रबंध किए। तीर्थ स्थानों का विकास भी इसी काल खंड में हुआ।
मगर, यह सब कुछ बहुत समय तक नहीं चल सका। धीरे-धीरे यूरोपीय शक्तियों ने अपनी शक्ति को बढ़ाना सुरू कर दिया था। उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएॅ भी भी सर उठाने लगीं थी। महदजी सिंधिया की पुणे में हत्या (1794 ई.) के बाद महज अगले कुछ सालों में ही (1802 ई.) मराठा परिसंघ के सभी केन्द्रों को ईस्ट इंडिया कम्पनी ने सहायक संधि के जाल में उलझा लिया। इस तरह पूरे देश पर अंग्रेजी हुकूमत कायम हुई।
अंग्रेजों के दमन चक्र से पूरा देश त्रस्त हो चुका था। हलांकि, स्वतंत्रता की चाहत में कुछ रजवाड़ों और सिपाहियों ने संग्राम (1857 ई.) का शंखनाद तो किया मगर वह असफल रहा। अगले कुछ सालों तक दमन चक्र आगे भी चलता रहा। मगर अंतर आया तो इस बात का कि अब भारत ईस्ट इंडिया कंपनी के आधिपत्य से निकलकर ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन चुका था।
लोगों को एक बार फिर स्वराज की विचारधारा ने आकर्षित किया। बड़ौदा नरेश सयाजी राव गायकवाड़ के संरक्षण और मार्गदर्शन अनेक बुद्धिजीवियों ने जन जागृति में अपना योगदान दिया। उन्होंने स्वराज, सुशासन और जनता के ज्ञानात्मक प्रबोधन में हर संभव सहायता की। उनके संपर्क में आने वाले शाहूजी महाराज, ज्योतिबा फुले, दादाभाई नौरोजी, अरविन्द घोश, महात्मा गाँधी, भीमराव अंबेडकर आदि सभी लोगों ने भारत और भारतीयों के उत्थान में सराहनीय भूमिका निभाई। विठ्ठलभाई पटेल, सरदार भगत सिंह, जवाहरलाल नेहरू आदि का सार्वजनिक जीवन भी स्वराज के विचार से प्रेरित था। स्वराज इन शुभ संकल्पों के परिणामस्वरूप भारत ने (1947 ई.) स्वतंत्रता हासिल की।
आधुनिक भारत के निर्माण की जो रूपरेखा सयाजी महाराज ने अपने अधीपत्य वाले बड़ौदा राज्य में रखी, उसी क्रम में भारत निर्माण का काम स्वतंत्रताप्राप्ति के बाद आगे बढ़ाया गया। एक सुशिक्षित और संगठित समाज किसी राष्ट्र के विकास का सबसे बड़ा आधार बनता है। स्वराज भी इसी संकल्प को सफल बनाने का प्रकल्प है।
⛳ जय हिन्द 🇮🇳 जय स्वराज ⛳