दीया तक तो ठीक था जिसको हम भारतीय प्रशासन ,भारतीय सेना, पुलिस, नर्सिग स्टाफ, डाक्टर,सफाई कर्मचारी उन तमाम लोगों को समर्पित कर सकते थे जो इस महामारी के दौरान पूरे जी-जान से देश सेवा और लोक सेवा में अपनी जान की परवाह किए बिना लगे हुए हैं । लेकिन जब दीया- पटाखे और आग का रूप ले लेती है तो न तो यह जश्न का प्रतीक होता है और ना ही किसी को सम्मान देने का । जहां तक मानना है कि हम लॉक डाउन के दौरान पर्यावरण में जो शुद्धता देख रहे थे उसमें दीपक की जगह पटाखे ,राकेट और मशाल जला कर के पर्यावरण को प्रदूषित करने काम किया जो मूर्खतापूर्ण कार्य है इस तरह ना तो किसी का धन्यवाद ज्ञापित किया जाता है और ना किसी का सम्मान । बहुत साधारण सी बात है जिसके दिल में हिंदुस्तान और हिंदुस्तान के दिल में जो इंसान रहता है उसे कोई एक से अनेक नहीं कर सकता है अगर ऐसा होता भी है तो समझ लीजिए वो हिंदुस्तान का था ही नहीं ।

गौर तलब है BJP का 40वीं स्थापना वर्षगांठ है 6 मार्च कही पूर्व सांध्य पर जस्न मनाने और दीपुत्सव पटाखे की पूर्व तैयारी भी हो सकती है और हमें याद रखना चाहिए कि

विज्ञान ड्यूटी पर है, #धर्म छुट्टी पर ।

हम वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं जिसमें धर्म और ईश्वर केवल आस्था और नैतिकता का प्रतीक हो सकतें है इससे ज्यादा कुछ नहीं खासतौर से विज्ञान के युग में।

Digvijay Singh सामाजिक कार्यकर्ता मिर्ज़ापुर उत्तरप्रदेश

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