अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट जाँजगीर चाँपा — श्रीमद्भागवत को ज्ञानयज्ञ सप्ताह कहा जाता है। सात दिन की कथा सुनकर आपने इसमें से क्या ग्रहण किया ? यह चिंतन करने की विषय है। यह मानव शरीर अत्यंत दुर्लभ और क्षणभंगुर है।अगर इस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण की कृपा नही मिल सका तो जीव को पुनः चौरासी लाख योनियों में भटकना पड़ेगा। श्रीमद्भागवत कथा श्रेष्ठ सत्कर्म है , इसके बिना मनुष्य जीवन बेकार है। यह कथा स्वर्ग में देवताओं को भी सुलभ नही है। अतः हमें जीवन को सफल बनाने के लिये श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण अवश्य ही करना चाहिये। उक्त बातें भागवताचार्य पं० देवीप्रसाद शुक्ला ने धार्मिक नगरी चाँपा में गो सेवा संगठन के पदाधिकारियों को संबोधित करते हुये कहा। उन्होंनें आगे कहा कि धर्म के बिना मनुष्य यंत्र के समान है। मानव समाज की संपूर्ण मनोवृत्तियों का ज्ञान भागवत में भरा है। इस ग्रंथ के पूजन व चिंतन करने से चरित्र और विवेक का विकास होता है। भागवत महात्म्य पर संक्षिप्त प्रकाश डालते हुये भागवताचार्य श्री शुक्ला जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा कल्पवृक्ष के समान मीठा होता है जिसमें गुल्ठी और छिलका नहीं होता बल्कि केवल रस ही रस होता है। इसकी कथा सुनने से मनुष्य का दैहिक , दैविक और भौतिक ताप दूर हो जाते हैं तथा धर्म ,अर्थ , काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है। श्रीमद्भागवत श्री राधागोविंद का वांगमय स्वरूप है जिसका दर्शन और स्पर्श भी कल्याणकारी होता है। इसके श्रवण करने से कलयुग में मनुष्य सभी दोषों और पापों से मुक्त होकर भागवत परायण बन जाता है। चारों वेद इसके वृक्ष है , अठारह पुराण इसके फल है। पुराणों के पांँच लक्षण मोक्ष की प्राप्ति है और यह सांसारिक जीवों के पार उतारने के लिये श्रेष्ठ सत्कर्म है जो बड़े भाग्य से मिलता है। श्रीमद्भागवत केवल पुरुषार्थ का विषय नहीं है बल्कि पूरे भारत की दिव्यता इसी में सन्निहित है। इसके श्रवण से इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाता है। “सत्यं परम् धीमहि” की व्याख्या पर उन्होनें कहा – “सत्य मेवेष्वरो लोके , सत्ये धर्म: सदाश्रीत:। सत्य मुलानी धर्माणी , सत्यानास्ति परम् पदम्।।”अर्थात – सत्य ही संसार में ईश्वर है। धर्म भी सत्य के आश्रित है। सत्य ही समस्त भव विभव का मूल है। सत्य से बढ़कर और कुछ भी नही है। मनुष्य जीवन में सत्य , दया , करूणा , क्षमा को अपनाना ही मानवता है। धर्म में प्रवेश करने से पहले सर्वप्रथम सीढ़ी सत्य ही है। सत्य के बिना धर्म की प्राप्ति असंभव है।

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