![] आप किसी से भी पूछिए, इस समय यही कहेगा कि कश्मीर में कुछ बड़ा होने वाला है। क्या होने वाला है। यह तो किसी को भी पता नहीं। लेकिन, कुछ बड़ा होने वाला है। इसका यकीन सबको है। यह हमारे आज के समय का प्रमुख विमर्श है। इतना ज्यादा कि हर कोई कश्मीर की तरफ मुंह ताक रहा है। लेकिन, इस खेल में जहां पर कुछ बड़ा हो रहा है, उस पर निगाह किसी की नहीं है।

पहले अपने एक दोस्त का किस्सा बताता हूं। हरिद्वार में ऑटो सेक्टर की एक बड़ी कंपनी से जुड़ी किसी सब्सिडियरी में नौकरी करते हैं। आजकल हालत पतली है। पूंजीपति और कारपोरेट अपने भाग्य में तो किसी को साझीदार नहीं बनाते, फटकने तक नहीं देते लेकिन दुर्भाग्य आते ही उसका बंटवारा सबसे पहले सबसे कमजोर और गरीब लोगों में करने लगते हैं। आजकल माल बिक नहीं रहा है तो कंपनी की हालत पतली है। मंदी का पहला भूत कास्ट कटिंग है। दूसरा छंटनी। पहला भूत यानी कास्ट कटिंग आ गया है। नौकरी पर सुबह छह बजे पहुंच जाना होता है। सुबह छह से शाम के छह बजे यानी बारह घंटे की यह नौकरी कैजुअल कर्मचारियों के लिए आठ हजार और नियमित कर्मचारियों के लिए 12 हजार की कीमत चुकाती है।

सुबह छह बजे पहुंचने पर यहां पर खाने का कूपन मिला करता है। पहले यह कूपन 22 रुपये का होता था। अब इसे दोगुना यानी 44 रुपये कर दिया गया है। यानी दोपहर का भोजन अब दोगुना मंहगा हो गया। शाम के समय पहले यहां सभी कर्मचारियों को चाय और चार बिस्कुट या एक समोसा दिया जाता था। यह कंपनी की तरफ से था। मुफ्त था। अब कास्ट कटिंग हो गई है। न चाय मिलेगी न बिस्कुट, न समोसा।

आप जानते हैं, कांवड़ के समय दिल्ली से लेकर मेरठ और हरिद्वार तक क्या हालत हो जाती है। इसके चलते यहां पर कांवड़ यात्रा के समय छुट्टी कर दी जाती थी। इस बार भी मैनेजमेंट ने छुट्टी कर दी। सात दिनों की। लेकिन, यह छुट्टी लीव विदाउट पे थी। यानी फोटो प्रातिनिधिक है और इंटरनेट से ली गई है)इसके पैसे नहीं मिलेंगे। वैसे भी मैनेजमेंट जब चाहता है, जिसको चाहता है, छुट्टी पर भेज देता है। मैनेजमेंट का साफ कहना है, जिसको इस पर काम करना है, वह काम करे। नहीं तो जिसको जहां बेहतर मिले, चला जाए।

लेकिन, जाएं कहां। यही वह सवाल है। क्या कोई जगह है, जहां पर जाया जा सकता है। इसी विकल्पहीनता का फायदा उठाया जा रहा है। तमाम खबरे आ रही हैं कि ऑटो सेक्टर में दस लाख से ज्यादा लोगों की नौकरियां खतरे में पड़ी हुई हैं। बीएसएनएल के हजारों कर्मचारी छंटनी की कगार पर बैठे हैं। रेलवे के तीन लाख से ज्यादा कर्मचारी अपनी नौकरियों और आगे वाली पीढ़ियों की नौकरियों के लिए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। बैकिंग सेक्टर में मंदी छाई हुई है। उनके पैसे लूटकर भ्रष्ट नेताओँ के यार विदेश भाग चुके हैं। सरकार ने कहा कि बैंकों के एकीकरण से नौकरियां नहीं जाएंगी। लेकिन, सोचने की बात यह है कि अगर एक ही बाजार में जहां पर तीनों बैंकों की शाखाएं मौजूद रही हैं, एकीकरण के बाद क्या वे तीनों शाखाएं अलग-अलग आपरेट करेंगी। सीधी सी बात है कि बाकी शाखाएं बंद हो जाएंगी और वहां काम करने वाले लोगों को गुलाबी पर्ची थमा दी जाएगी।

गुलाबी पर्ची पकड़ाने का यह दौर तेजी से चल पड़ा है। कुछ समाचार पत्रों में आज एजेंसी के हवाले से छपी खबर बताती है कि बीते तीन माह के अंदर ऑटो सेक्टर में दो लाख से ज्यादा नौकरियां जा चुकी है। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल्स डीलर्स एसोसिएशन यानी फाडा के हवाले से खबर है कि वाहनों के नहीं बिकने के चलते डीलरशिप स्टोर से दो लाख लोगों को नौकरी से निकाला जा चुका है। जबकि, बीते 18 महीने में देश के 271 शहरों में वाहनों के 286 शोरूम बंद हुए हैं और यहां से 32 हजार से ज्यादा लोगों को नौकरी से निकाला गया है। यह 32 हजार दो लाख नौकरियों के अतिरिक्त है। देश में लगभग 15 हजार ऑटो डीलर के 26 हजार के लगभग शोरूम है। और इसमें लगभग 25 लाख लोग सीधे और 25 लाख लोग परोक्ष रूप से रोजगार पाते हैं। इन सभी के रोजगार पर खतरा मंडरा रहा है।

ऑटो सेक्टर पर सुस्ती की यह मार चुनावों से पहले ही शुरू हो गई थी। लेकिन, आमतौर पर डीलरों में यह विश्वास था कि नई सरकार के आने के साथ ही यह समाप्त हो जाएगी। लेकिन, नई सरकार के आने, प्रचंड बहुमत पाने के बाद भी मंदी के जिन्न से छुटकारा नहीं मिला है। बल्कि अपने हर चक्र में इसका घेरा और बड़ा होता जा रहा है।

अगर हम अपने आसपास थोड़ा सा नजर डालें तो हम भी इसे देख सकते हैं। अपने घर से मेट्रो पकड़ने के लिए लगभग 700 मीटर मुझे पैदल चलना पड़ता है। इस सात सौ मीटर की दूरी पर हजारों दुकानें मौजूद हैं। अक्सर ही मैं किसी नई दुकान का उद्घाटन होते हुए देखता हूं। पहले तो दुकान का फर्नीचर बनवाया जाता है। फिर उसका उद्घाटन होता है। लड्डू बंटते हैं। परिवार और रिश्ते-नाते वाले खुशी में एकत्रित हो जाते हैं। फिर दुकान पर ग्राहक का इंतजार शुरू हो जाता है। तीन-चार महीने का ग्राहकों का इंतजार करते-करते थककर दुकानदार दुकान बंद कर देता है। एक दो महीने दुकान बंद रहती है, फिर किसी को लगता है कि वहां पर दूसरी किसी चीज की दुकान खोली जाती है। वह दुकान किराए पर लेता है। नए सिरे से फर्नीचर बनवाता है। फीता कटता है, लड्डू बंटते हैं और फिर से ग्राहक का इंतजार शुरू हो जाता है।

कई-कई दुकानों में तो मैं हर दूसरे-तीसरे महीने एक नई दुकान खुलता और बंद होता हुआ देखता हूं।

यह मंदी का जिन्न है, यह जितने लोगों का खून पीता है, उतना ही ज्यादा बड़ा होता जाता है। यह अपने आकार में लगातार और विशाल होता जा रहा है।

कश्मीर में चाहे जितना बड़ा हो जाए, लेकिन, यह बात साफ है कि वह उससे बड़ा नहीं होने वाला, जो आज हमारे-आपके जीवन में हो रहा है। हमारे-आपके जीवन में ज्यादा बड़ा हो रहा है। कश्मीर से भी बड़ा।

जादूगर का वह हाथ मत देखो, जो वह दिखाना चाहता है। उस हाथ पर निगाह रखो, जो वह छिपाना चाहता है। कितने लोग हैं, जो उस हाथ पर निगाह रखने के लिए तैयार हैं।

सूत्र parveen chaudhary fb wall

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