![] राजनीति में वंशवाद, भाई-भतीजावाद, परिवारवाद जैसी बातें सामने आती रहती हैं, और तकरीबन सभी पार्टियों को इससे गुरेज परहेज भी है लेकिन अति महत्वाकांक्षी और सत्ता की चाहत और पद लोलुपता के चलते सारे आदर्शों की बलि भी इस राजनीति की बेदी पर चढ़ती देखी गई है। आज तकरीबन कोई भी पार्टी इससे अछूती नहीं हैं। राजनीति में परिवार वाद का बढ़ना राजनीतिक सोच की धार को कुन्द करता है। परिवार वाद की सियासत अहंकार और हिटलर शाही से लबरेज होती है, इससे ग्रसित वयक्ति अपने आप को विरासती मानता है लिहाजा मानसिक कुठाओं का शिकार होना लाजिमी है। अभी हाल ही में बसपा सुप्रीमों मायावती ने संगठनात्मक ढ़ांचे में बदलाव किया है जिसमें उन्होंने अपने भाई और भतीजे को पार्टी में अहम जिम्मदारी दी है। बस फिर क्या था बसपा का स्लोगन ‘बहुजन हिताय,बहुजन सुखाय’ को ही राजनीतिक आलोचकों ने परिजन सुखाय का नारा देकर मामले को हवा दे दी , अगर मायावती ने ऐसा किया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ाा इस परिपाटी पर चलने के लिए अकेली मायावती ही दोषी क्यों हैं।
मायावती ने तो अब किया लेकिन इससे पहले दिग्गज पार्टियां इस परिपाटी पर क्यों और कैसे चल पड़ी । परिवार वाद की राजनीति की बुनियाद दरअसल कांग्रेस के दौर से शुरू हो चुकी थी, आजादी के बाद से कांग्रेस में एक से एक दिग्गज और काबिल नेताओं के होने के वावजूद उनकी अनदेखी करके जवाहर लाल नेहरू ने इंदिरा गांधी का राजनीति में पदार्पण कराया था उसके बाद से तो कांग्रेस के हर नेता जैसे इस वायरस से ग्रसित हो गया नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस का हर नेता अपने परिवार के सदस्यों को आगे लाने की दौड़ में शामिल हो गया, जिसका नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से परिवार वाद की कश्ती पर सवार होकर चल पड़ी। दरअसल राजनीति में परिवार वाद की परम्परा अपनी राजनीतिक विरासत को बचाये रखने के लिए जरूरी भी हो जाता है कि वो परिवार वाद की बैसाखी के सहारे चले जिसमें विश्वास कायम रहता है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने भी परिवार वाद की राजनीति को बढ़ावा दिया आज यादव परिवार के भाई भतीजे सक्रिय राजनीति का हिस्सा बने हुये थे, भले ही उनमें टकराव जैसे हालात हो।
मेरा मानना है कि परिवार वाद की राजनीति की परम्परा अपनाने के पीछे कहीं दल बदल की राजनीति तो जिम्मेदार नहीं। बहरहाल कांग्रेस पर तकरीबन सभी पार्टियां वंशवाद की राजनीति करने का इल्जाम लगाकर हो हल्ला करती रही है जिसका सिर्फ और सिर्फ मतदाताओं को भ्रमित करके मत विभाजन करना हो सकता है। आज पार्टी विद डिफरेंस का लेबल चस्पा करे हुई भारतीय जनता पार्टी भी इस वायरस से ग्रसित है भले ही वो कांग्रेस के ऊपर हमलावर रही हो लेकिन उसके नेताओं को भी अपने गिरहबान में झांक कर देखना चाहिए कि वो खुद इससे कितने दूर हैं। चलिए भारतीय जनता पार्टी की तरफ रूख करके देखते हैं कि उनके अन्दर परिवार वाद की बेल किस तरह से फैल रही है। कभी भारतीय जनता पार्टी के सबसे विश्वास पात्र रहे पूर्व वित्त मंत्री यशवन्त सिन्हा जो अपनी उपेक्षा के चलते भाजपा से किनारा कर गये थे उनके बेटे जयंत सिन्हा केन्द्र की मोदी सरकार में मंत्री पद सुशोभित कर रहे हैं। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में केन्द्रिय कानून मंत्री रहे रवि शंकर प्रसाद भी परिवार वाद की सियासत को लेकर हमेशा हमला बोलते रहे हैं लेकिन वो खुद जनसंघ के बड़े नेता और बिहार में संयुक्त विधायक दल में मंत्री ठाकुर प्रसाद की वंश बेल हैं।
मोदी सरकार में केन्द्रिय रेल मंत्री खुद अटल सरकार में मंत्री रहे वेद प्रकाश गोयल के बेटे हैं, वहीं भाजपा के कद्दावर नेताओं में शुमार और राज्स्थान के राज्यपाल रहे कल्याण सिंह खुद इस बीमारी से ग्रसित हैं उनके बेटे राजवीर सिंह सांसद हैं तो उनकी पत्नी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रही है जबकि उनके नाती संदीप सिंह विधायक हैं। केन्द्रिय गृह मंत्री रह चुके राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह खुद विधायक हैं। मध्य प्रदेश के राजमहल से महारानी विजयराजे सिन्धिया की बेटियां वसुन्धरा राजे और यशोधरा राजे मंत्री पद सुशोभित कर चुकी हैं जबकि वसुन्धरा राजे के बेटे दुष्यंत भाजपा सांसद हैं। छत्तीस गढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह सक्रिय राजनीति में हैं, तो प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर भाजपा युवा मोर्चे के कद्दावर नेता में शुमार होते हैं।
सबसे ज्यादा चैंकाने वाली बात आपके सामने रखता हूं कि गोंडा में एक सभा में नरेन्द्र मोदी ने गोंडा में शिक्षा माफियाओं के सक्रिय होने को लेकर बड़ा बयान दिया था और ये मंच था भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे प्रतीक भूषण का जो उत्तर प्रदेश के सांसद बृज भूषण शरण सिंह के बेटे हैं, आपको बता दें कि बृज भूषण सिंह के गोंडा में तीन दर्जन से ज्यादा स्कूल हैं ऐसे में नरेनद्र मोदी का बयान हास्यापद ही कहलाया जायेगा। बहरहाल भाजपा में भी कई दर्जन नेता अभी बाकी है जिनका उल्लेख मैंने नहीं किया है। वंशवाद के मामले में भारतीय जनता पार्टी सबसे ज्यादा हमलावर रहती है लेकिन अपने चार दशक के जीवन काल में भारतीय जनता पार्टी जिस तेजी के साथ वंशवाद की बेल को फैला रही है उससे ऐसा कयास लगाया जा सकता है कि आने वाले 50 सालों में भाजपा से बड़ी वंशवाद वाली पार्टी और दूसरी कोई नहीं होगी। ंसवाल ये है कि अगर भारतीय जनता पार्टी के लिए परिवार वाद की राजनीति गलत है तो फिर उनके द्वारा फैलाई जा रही परिवार वाद की वंश बेल अच्छी क्यों है?
सलीम रज़ा
देहरादून, उत्तराखण्ड
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