![] उत्तराखंड शायद पहला ऐसा प्रदेश होगा जहां प्रदेश के बाहर से आये अधिकारी-कर्मी एवं अन्य लोग तो काट रहे हैं मौज मगर प्रदेश का मूल निवासी बेसिक फैसिलिटी पाने के लिए भी तड़पने को है मजबूर

प्रदेश का मूल निवासी अपने को अपने ही प्रदेश में ठगा सा कर रहा है महसूस

आप पंजाब जाओ, यूपी जाओ, गुजरात जाओ, महाराष्ट्र जाओ हिमाचल या फिर नार्थईस्ट जाओ चाहे भारत के किसी भी अन्य जोन के किसी भी राज्य में चले जाओ वहां के लोकल आदमी और भाषा को तवज्जो मिलती है मगर हमारे उत्तराखंड में गजब हाल है। शासन-प्रशासन हो या हो पुलिस महकमा चाहे हो कोई अन्य जगह बाहरियों की जमकर तूती बोलती है वह अपने मन मर्जी से पोस्टिंग और काम करते हैं। मेरा किसी से कोई बेर नहीं भारत एक है और कोई भी कंही भी जाकर काम करने के लिए स्वतंत्र है, मगर हां मेरी नाराजगी उन लोगों और अधिकारियों से जरूर है जो उत्तराखंड में कमा खा तो खूब रहे हैं मगर यंही के मूल निवासियों को न केवल दबा रहे हैं बल्कि कुछ अधिकारी-कर्मचारी तो ऐसे भी हैं जो बंद कमरों में बैठ उत्तराखंड और उसके मूल निवासियों को खूब गरियाते हैं और यंही अहम पद चाहते भी हैं।

क्या ऐसी मानसिकता वाले लोग करेंगे उत्तराखंड का विकास। क्या 19 साल बाद भी उत्तराखंडियों को गाली बककर कुछ अधिकारी-कर्मचारी व अन्य लोग उत्तराखंड में पहले की तरह यूँ ही काटते रहेंगे मौज, आखिर कब जागेंगे हम।

उत्तराखंड की पीड़ा देखिये अगर आपने यहां पहाड़ियों की बात कर दी, पहाड़ के विकास की बात कर दी या फिर दो उत्तराखंडी आपस मे घुल-मिलकर बैठ गए तो आप तुरंत आ जाएंगे ऐसे लोगों की एन्टी पहाड़ गैंग के निशाने पर, वह तुरंत आप पर लगाने लगेंगे ‘पहाड़-प्लेन वाद’ फैलाने का आरोप, जगह-जगह करने लगेंगे आपको बदनाम।

बाहरी आएं खूब आएं, महत्यपूर्ण पदों पर भी बैठें किसी को कोई गुरेज नहीं हम सब एक हैं मगर कम से कम पहाड़ और पहाड़ियों को गाली तो न बकें, यहां से कमा रहे हैं तो यहां के विकास में भी अपना योगदान दें। सिर्फ लूटने और नोचने की मानसिकता लेकर न बैठें।

आशीष कुमार ध्यानी लेखक

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