हिन्दुस्तान को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का गौरव हासिल है। विश्व में गंगा-जमुनी तहजीब के लिए मिसाल बन चुका भारत अब करीब-करीब इस मिसाल से दूर होता जा रहा है, बिल्कुल ऐसे जैसे कभी भारत सोने की चिड़िया कहलाता था। आज ये बात इतिहास के पन्नों में कैद होकर रह गई है। आज के परिदृष्य में जिस तरह से चुनाव हो रहें हैं लगता ही नहीं कि ये चुनाव देश की सबसे बड़ी संस्था संसद के लिए हो रहे है।ं वल्कि अब हो रहे चुनावों की शक्लो-सूरत किसी पंचायत चुनाव की तरह हो गई है जिसमें धन,बल,शस्त्र, हिंसा और खून-खराबा देखने को मिल रहा है। जैसे-जैसे हम तरक्की की पायदान चढ़ने का ढिंढोरा पीट रहे हैं वैसे-वैसे सियासत का ग्राफ रसातल की ओर तेजी से बढ रहा है। बहरहाल अब चुनाव समपन्न हो रहे हैं और 23 मई को नतीजे भी आ ही जायेंगे ऐसे में अब तक के हुए चुनाव सेें लगता है कि संसद के मंदिर में एक बार फिर भगवा धूम होगी। शायद ज्यादातर लोगों का ये ही मानना है कि एक बार फिर संसद में भगवा नजारा ही होगा लेकिन जिस तरह से हालात उपजे हैं उसे देखकर मन में शंका अवश्य हो रही है कि शायद इस बार सत्ता के सिंहासन पर भगवा ताजपोशी नहीं हो पायेगी,आईये देखते हैं कि हिन्दुस्तान में किस तरह का माहौल बना है। ये बात तो किसी हद तक सही है कि 2019 के आम चुनाव सबसे मुश्किल चुनावों मे से एक हंै और इस चुनाव में खासतौर से दो ऐसी बाते निकलकर सामने आ रही हैं जो भारतीय जनता पार्टी के सियासी गणित को बिगाड़ रही हैं। ये सियासी गणित है उत्तर और दक्षिण भारत की सियासत का जहां तेजी से राजनीतिक विभाजन देखा गया है। देश की सियासत का अहम केन्द्र बना उत्तर भारत में शहरी और ग्रामीण मत विभाजन लेकिन उत्तर भारत में इस बार भी मोदी मैजिक चला है ये बात दीगर है कि ये मैजिक 2014 की तरह नहीं रहा है। अगर बात करें दक्षिण भारत की तो वहां भी सियासत का मिजाज कुछ बदला हुआ जरूर है। भारतीय जनता पार्टी भी अपनी सियासत का गढ़ कहे जाने वाले उत्तर भारत के सियासी कुरूक्षेत्र उत्तर प्रदेश में 2014 की जीत का मंसूबा पाले बैठी है , लेकिन इस बार हुये चुनावों में एक बड़ा अन्तर देखने को मिला वो था शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की वोटिंग। इसलिए भाजपा ने अपने वोट बैंक को बैलेन्स करने के लिए रूख करा दक्षिण भारत की तरफ ये बात अलग है कि यहां भाजपा हमेशा से जद्दो जहद करती रही है। बात करें तेलांगना और आन्ध्र प्रदेश की तो ये वो प्रदेश हैं जहां मतदताओं ने दोनो ही राष्ट्रीय पार्टियों भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस को दरकिनार कर दिया है इन पार्टियों में वहां के मतदाताओं की कोई दिलचस्पी नहीं है। तेलांगना और आन्ध्रप्रदेश में क्षेत्रिय पार्टियों का अपना वजूद है या यूं कह लें उनका दबदबा है। कर्नाटक की सियासत पर नजर दौड़ायें तो यहां पर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी थेड़ी बहुत राह जरूर बनाई है, लेकिन यहां पर भी कांग्रेस और जनतादल एस गठबन्धन ने प्रदेश के अन्दर भाजपा को कड़ी चुनौती पेश की है। अब देखना ये होगा कि हाल में संपन्न हुये चुनाव में इस गठबन्धन की केमिस्ट्री क्या रंग लायेगी ये तो चुनाव परिणाम ही बतायेंगे।अभी हाल ही में सबरीमाला प्रकरण में आये उच्चतम न्यायालय के आदेश से केरल की सियासत में गर्माहट जरूर आई है और इसका क्रेडिट भाजपा ने भुनाने की कोशिश भी करी है लेकिन ये मामला महिलाओं से जुड़ा था इसलिए केरल में भाजपा को कड़े इम्तिहान से गुजरना पड़ेगा।दूसरी तरफ वायनाड से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में राहुल गांधी हैं कयास ये लगाया जा रहा है कि राहुल गांधी भाजपा की धार को कमजोर करने की कड़ी हो सकते हैं । अब बात करते हैं तमिलनाडु की वहां असेम्बली की 22 सीटों पर उपचुनाव हो रहा है ऐसे में वे चुनाव संसदीय चुनावों से ज्यादा अहम है लिहाजा वहां पूरा फोकस विधानसभा उप चुनावों पर है लिहाजा दक्षिण भारत में भारतीय जनता पार्टी की हालत कमजोर हो सकती है। आपको बता दें कि इस चुनाव में भाजपा का राष्ट्रीय सुरक्षा से लबरेज राष्ट्रवाद का मुद्दा हो या फिर गोरक्षा की आड़ में हिन्दुत्व का एजेन्डा हो दक्षिण भारत में इन मुद्दों की कोई अहमियत नहीं है। तमिलनाडु में भाजपा ने राम मंदिर को आगे रखकर रथयात्रा निकाली लेकिन वहां इस मुद्दे को भी लोगों ने नकार दिया है।

अब नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने अपना सारा ध्यान उत्तभारत की तरफ कर दिया इसी का नतीजा है कि उत्तरप्रदेश में इनकी बेहिसाब रैलियों का होना क्योकि यहां शहरी क्षेत्र के मतदाताओं ने भाजपा से ज्यादा नरेन्द्र मोदी में अपना यकीन जताया है। अब चूंकि उत्तर प्रदेश में आखिरी चरण का मतदान होना है ऐसे में उत्तर प्रदेश में सवर्ण वनाम पिछडों का जातीय धु्रवीकरण है जहां तक शहरी क्षेत्र के मतदाता भाजपा के समर्थन में हैं तो वहीं जातिय धु्रवीकरण के चलते दलित और पिछड़े सपा -बसपा और क्षेत्रीय दलों के साथ खड़े है।ं बहरहालदक्षिण भारत से कमजोर होती हुई भाजपा पश्चिम बंगाल में जाकर और कमजोर दिख रही है। वहीं उत्तर भारत में जातीय समीकरण और मुस्लिम मत विभाजन के चलते भाजपा को वह कामयाबी हाथ नहीं लगेगी जो उत्तर प्रदेश से 2014 में लगी थी। बहरहाल,दक्षिण भारत से लेकर पश्चिम बंगाल और पूरे उत्तर भारत में भाजपा को इस चुनाव में उतनी सीटें अर्जित नहीं कर मिलेंगी जितनी 2014 में मिली थी। कहने का मतलब ये है कि इस बार वन मैन आर्मी के रूप में चल रही भाजपा के लिए महा गठबन्धन बहुत बड़ा रोड़ा है ऐसे में ये कहना कि अबकि बार भी पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा संसद में प्रवेश करेगी शंकाओं से घिरा लगता है लेकिन स्थिति तो परिणाम आने के साथ ही स्पष्ट होगी।

सलीम रज़ा

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